लो बम्बई मै समुन्दर है , क्या कलकत्ता कलंदर है।
ये दिल्ली से भी सुंदर है ।
मगर जलवायु में अपना इटावा ३ नंबर है॥
न माने गुरू टीचर को, पढ़न जाबे शनीचर को।
जो देखे रोज पिक्चर को , बनाएगा क्या फ्यूचर को?
पिए सिगरेट सीजर छात्र पूरा ३ नंबर है॥
Thursday, November 26, 2009
Wednesday, November 18, 2009
Monday, November 16, 2009
Sunday, November 8, 2009
कवि पंगु की जन्मस्थली खिरिया
जीवन है मेरा खुली किताब की तरह ।
कुछ भी ग़लत नही सही हिसाब की तरह॥
फौलाद सा सीना है मगर पैरो से पंगु हूँ ,
मन है काँटों में खिले गुलाब की तरह॥
उक्त पंक्तियाँ ओज के मूर्धन्य कवि श्री शिवशरण अवस्थी पंगु की हैं, जिन्होंने किशोरावस्था में १६ वर्ष की उम्र में अध्यात्मिक चिंतन पर आधारित अवस्थी चेतावनी की रचना की। जिसका प्रकाशन ३ साल बाद १९५५ में हुआ तब पंगुजी की आयु मात्र १९ वर्ष थी। उनकी अमर कृति सिपाही १९६४ में छपीयह खंडकाव्य देश भर में खाफी सराहा गया। सम-सामयिक सत्तावन जली चिताए, ठगिनी चीन और कश्मीर घाटी नामक पुस्तकों ने पंगु जि को उन्चाइओं पर पहुचाया। इटावा में आश्रयदाता वैद्यराज श्री ज्ञान चन्द जैन के सम्मान में ज्ञान बावनी की रचना की । देश के विभिन्न मंचों पर बैशाखी के बल पर ओज का उद्घोष कराने वाले कवि पंगु की रचनाये ८० के दशक में आकाशवाणी लखनऊ से भी प्रसारित हुई।ओज के सशक्त हस्ताक्षर पंगुजी का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के खिरिया गांव में १९३६ में हुआ उनके पिता श्री श्यामले प्रसाद वेदांती ब्राह्मण थे अरिंद नदी की तलहटी में बसा खिरिया गाँव भयानक सैलाबी विभीषिका से अस्त-व्यस्त हुआ, कई वर्षों तक बाढ़ की वजह से जब कोई उपज नहीं हुई तब वे अपने बड़े भाई श्री रामशरण के साथ पैसा कमाने १९५५ में इटावा आ गए और वैद्यराज श्री ज्ञान चन्द जैन के औषधालय में दवा कूटने लगे औषधि कूटने के साथ गुन-गुनाते हुए रचनाधर्मिता का निर्वाह भी करते रहे पंगु जी कविता वैद्यराज श्री ज्ञान चन्द जैन अपने साप्ताहिक महावीर में छापने के साथ प्रति कविता एक रूपया इनाम देते थे कुछ समय बाद दोनों भाई ट्यूशन भी पढाने लगे १९६० से वे भाई साहब के साथ श्री ज्ञान चन्द्र दिगंबर जैन पाठशाला में पढाने लगे। १९९१ में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके साहित्यिक उत्तराधिकारी कवि देवेश शास्त्री ने कवि पंगु की जन्मस्थली खिरिया (मैनपुरी ) में खिरिया महोत्सव शुरू करने का स्वप्न देखा और जून २००८ में दो दिवसीय खिरिया महोत्सव आयोजित किया।दिन में विद्वानों के प्रवचन व पहली रात धनुष भंग परशुराम संबाद जुआ, दूसरी रात में कवि सम्मलेन, जिसमे पंगुजी के साथी कविओं के आलावा शिष्य परम्परा में नई परम्परा के कवियों ने न केवल काव्य पाठ किया बल्कि उस साहित्यिक विभूति की जन्मस्थली की रज को प्रणाम किया। कुल मिलाकर ३८ कविओं ने इस आयोजन में विना पारिश्रमिक के भाग लिया, इतना ही नही मार्ग व्यय भी स्वयं वहन किया।
कुछ भी ग़लत नही सही हिसाब की तरह॥
फौलाद सा सीना है मगर पैरो से पंगु हूँ ,
मन है काँटों में खिले गुलाब की तरह॥
उक्त पंक्तियाँ ओज के मूर्धन्य कवि श्री शिवशरण अवस्थी पंगु की हैं, जिन्होंने किशोरावस्था में १६ वर्ष की उम्र में अध्यात्मिक चिंतन पर आधारित अवस्थी चेतावनी की रचना की। जिसका प्रकाशन ३ साल बाद १९५५ में हुआ तब पंगुजी की आयु मात्र १९ वर्ष थी। उनकी अमर कृति सिपाही १९६४ में छपीयह खंडकाव्य देश भर में खाफी सराहा गया। सम-सामयिक सत्तावन जली चिताए, ठगिनी चीन और कश्मीर घाटी नामक पुस्तकों ने पंगु जि को उन्चाइओं पर पहुचाया। इटावा में आश्रयदाता वैद्यराज श्री ज्ञान चन्द जैन के सम्मान में ज्ञान बावनी की रचना की । देश के विभिन्न मंचों पर बैशाखी के बल पर ओज का उद्घोष कराने वाले कवि पंगु की रचनाये ८० के दशक में आकाशवाणी लखनऊ से भी प्रसारित हुई।ओज के सशक्त हस्ताक्षर पंगुजी का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के खिरिया गांव में १९३६ में हुआ उनके पिता श्री श्यामले प्रसाद वेदांती ब्राह्मण थे अरिंद नदी की तलहटी में बसा खिरिया गाँव भयानक सैलाबी विभीषिका से अस्त-व्यस्त हुआ, कई वर्षों तक बाढ़ की वजह से जब कोई उपज नहीं हुई तब वे अपने बड़े भाई श्री रामशरण के साथ पैसा कमाने १९५५ में इटावा आ गए और वैद्यराज श्री ज्ञान चन्द जैन के औषधालय में दवा कूटने लगे औषधि कूटने के साथ गुन-गुनाते हुए रचनाधर्मिता का निर्वाह भी करते रहे पंगु जी कविता वैद्यराज श्री ज्ञान चन्द जैन अपने साप्ताहिक महावीर में छापने के साथ प्रति कविता एक रूपया इनाम देते थे कुछ समय बाद दोनों भाई ट्यूशन भी पढाने लगे १९६० से वे भाई साहब के साथ श्री ज्ञान चन्द्र दिगंबर जैन पाठशाला में पढाने लगे। १९९१ में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके साहित्यिक उत्तराधिकारी कवि देवेश शास्त्री ने कवि पंगु की जन्मस्थली खिरिया (मैनपुरी ) में खिरिया महोत्सव शुरू करने का स्वप्न देखा और जून २००८ में दो दिवसीय खिरिया महोत्सव आयोजित किया।दिन में विद्वानों के प्रवचन व पहली रात धनुष भंग परशुराम संबाद जुआ, दूसरी रात में कवि सम्मलेन, जिसमे पंगुजी के साथी कविओं के आलावा शिष्य परम्परा में नई परम्परा के कवियों ने न केवल काव्य पाठ किया बल्कि उस साहित्यिक विभूति की जन्मस्थली की रज को प्रणाम किया। कुल मिलाकर ३८ कविओं ने इस आयोजन में विना पारिश्रमिक के भाग लिया, इतना ही नही मार्ग व्यय भी स्वयं वहन किया।
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